सोमवार, 20 दिसंबर 2010

in respect of the audiance

कितना दिलकश कितना रंगीन है आज मौसम ,
कैसे सज-धज के आज कितने लोग आये है |
सबके कपड़ो में चमकदार झील-मिलाह्ट है,
लग रहा है कि जैसे जुगनुओं के साये है |
या इन्हें देखकर कुछ इस तरह लगता है ,
कि ज्यों आसमान से सितारे उतर आये हैं |
सुन रहे है वो बड़ी गौर से गजले मेरी ,
जैसे फ़िक्र अपने घर पे छोड़ आये है |
अपनी ठुड्डी को अंगूठे का सहारा देकर ,
मेरे रुखसार पे वो टकटकी लगाए हैं |
कुछ बड़े गौर से देखें मेरा अंदाज़े-बयाँ ,
कुछ मेरे साथ मेरे सुर में सुर मिलाये हैं |
ऐसे लोगों का तहदिल से शुक्रगुज़ार है नाज़ ,
जिन्होंने साथ बैठकर ये पल बिताएं हैं |

2 टिप्‍पणियां: