उफ़ ये ज़िन्दगी का इम्तिहाँ और इम्तिहाँ के पर्चे ,
ज़िन्दगी कट गयी बस ख्यालो से गुज़रते |
कदम-कदम पे अटकले और अटकलों के सिवा ,
कभी घर की परेशानी और कभी मसले बहार के |
कभी रोटी की चिंता, कभी नौकरी का सवाल ,
अधमरा हो गया हूँ मै इन्ही सवालों से लड़ते |
सोच ने उम्र से पहले ही झपट ली जवानी ,
बुडापा आ गया नजदीक , सोचो से उलझते |
लेकिन उम्मीद बाकि है अभी हारा नहीं हूँ मै ,
ठोकरों ने सिखा दिया है बस रहना है लड़ते |
यहं खुद्दार लोगो के ही बस बनते है किस्से ,
जो किसी भी मुसीबत से कभी नही डरते |
तुम्हे तो जीतना है नाज़ ये मुझको यकीन है ,
तेरी फितरत रही है चलना तुफानो से लड़ते
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