खड़ा तैयार होगा कल ये तेरे साथ चलने को ,
एक करवट काफी है जहां का रूख बदलने को |
सूरज निकलता है फिर उसमे तपिश आती है ,
फिर दो-पहर लग जाते है उसकी शाम ढलने को |
जरा देखो तो कितना सब्र करता है बांस का पौधा ,
सुना है सौ बरस लगते है उसमे फूल खिलने को |
परवाना भले ही जनता है यह की मौत है आगे ,
बरोबर तडफता है पर उसी शमा पे जलने को |
तेरे होठो की जुम्बिश ने किया है नाज़ पर जादू ,
खड़ा तैयार है वो हर मुशीबत को कुचलने को |