मंगलवार, 8 नवंबर 2011

करवट

खड़ा तैयार होगा कल ये तेरे साथ चलने को ,
एक करवट काफी है जहां का रूख बदलने को |

सूरज निकलता है फिर उसमे तपिश आती है ,
फिर दो-पहर लग जाते है उसकी शाम ढलने को |

जरा देखो तो कितना सब्र करता है बांस का पौधा ,
सुना है सौ बरस लगते है उसमे फूल खिलने को |

परवाना भले ही जनता है यह की मौत है आगे ,
बरोबर तडफता है पर उसी शमा पे जलने को |

तेरे होठो की जुम्बिश ने किया है नाज़ पर जादू ,
खड़ा तैयार है वो हर मुशीबत को कुचलने को |

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